कोटवारी भूमि पर मालिकाना हक नहीं, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की संवैधानिक पीठ का बड़ा फैसला

Spread the love। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने कोटवारी भूमि के स्वामित्व को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि कोटवारों को सेवा के लिए दी गई भूमि पर न तो मालिकाना हक मिलेगा और न ही उसे भूमिस्वामी अधिकार में परिवर्तित किया जा सकता है।मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा, न्यायमूर्ति…

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। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने कोटवारी भूमि के स्वामित्व को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि कोटवारों को सेवा के लिए दी गई भूमि पर न तो मालिकाना हक मिलेगा और न ही उसे भूमिस्वामी अधिकार में परिवर्तित किया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा, न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल और न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की पूर्ण पीठ (फुल बेंच) ने अपने फैसले में कहा कि मध्यप्रदेश एबोलिशन एक्ट, 1950 लागू होने के बाद मालगुजारों एवं प्रोपराइटरों की समस्त संपत्तियां राज्य सरकार में निहित हो गई थीं। इसके साथ ही 1950 से पूर्व कोटवारों को गांव की सेवा के लिए दी गई सर्विस लैंड भी राज्य में निहित हो गई।
पीठ ने कहा कि एबोलिशन एक्ट लागू होने के बाद राज्य और कोटवार के बीच मालिक और सेवक का संबंध बना रहा। मध्यप्रदेश/छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 183 के अनुसार कोटवार को भूमि केवल गांव की सेवा करने की शर्त पर दी जाती है। यदि वह पद छोड़ देता है, सेवा से हटाया जाता है या उसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है, तो वह भूमि उसके पास नहीं रह सकती और अगले नियुक्त कोटवार को उपलब्ध कराई जाएगी।
अदालत ने अपने फैसले में पूर्व के ‘चरण दास’ प्रकरण का भी उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को भूमिस्वामी अधिकार देने से पहले यह देखना आवश्यक है कि भूमि का हस्तांतरण किस प्रकार हुआ तथा क्या राज्य ने उसे वैध रूप से मान्यता दी है। यदि भूमि सेवा भूमि (सर्विस लैंड) है, तो उसे भूमिस्वामी भूमि घोषित नहीं किया जा सकता।
संवैधानिक पीठ ने एकलपीठ द्वारा भेजे गए विधिक प्रश्न का उत्तर ‘नहीं’ में देते हुए स्पष्ट किया कि कोटवार या उसके उत्तराधिकारियों को सेवा भूमि पर भूमिस्वामी अधिकार नहीं दिए जा सकते।
अब इस मामले से संबंधित लंबित याचिकाओं को उनके गुण-दोष (मेरिट) के आधार पर सुनवाई के लिए संबंधित रोस्टर पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
गौरतलब है कि कोटवारी भूमि पर मालिकाना हक की मांग को लेकर कई याचिकाएं हाई कोर्ट में लंबित हैं। इन्हीं मामलों में उठे महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न पर एकलपीठ ने फैसला करने के बजाय मामले को संवैधानिक पीठ के समक्ष भेजा था, जिस पर अब यह ऐतिहासिक निर्णय सामने आया है।

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