बलरामपुर। जिला शिक्षा अधिकारी प्रभारी मनीराम यादव के विरुद्ध शैक्षणिक मदों की खरीदी में करोड़ों रुपये की अनियमितता के आरोपों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच अब उनका पक्ष सामने आया है। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी में विभिन्न सामग्रियों की खरीदी से लेकर आपूर्ति, वितरण, गुणवत्ता परीक्षण, भौतिक सत्यापन और भुगतान तक की प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप किए जाने का दावा किया गया है। ऐसे में जांच के अंतिम निष्कर्ष सामने आने से पहले डीईओ को सीधे तौर पर दोषी ठहराना जल्दबाजी माना जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, साइकिलों की खरीदी राज्य स्तर पर संचालक लोक शिक्षण संचालनालय के माध्यम से जेम पोर्टल पर ऑनलाइन प्रक्रिया से की गई। खरीदी गई साइकिलें संबंधित विकासखंड शिक्षा अधिकारियों को उपलब्ध कराई गईं। इसके बाद गठित समिति द्वारा उनकी गुणवत्ता का परीक्षण किया गया और विकासखंड शिक्षा अधिकारियों के माध्यम से संबंधित विद्यालयों तक साइकिलें पहुंचाई गईं। पात्र विद्यार्थियों को जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में साइकिलों का वितरण कराया गया।
इसी प्रकार फर्नीचर की आपूर्ति भी संबंधित शैक्षणिक संस्थाओं में कराई गई। सामग्री प्राप्त होने के बाद संस्थाओं से पावती ली गई तथा उपलब्ध फर्नीचर का गुणवत्ता परीक्षण कराया गया। आपूर्ति एवं गुणवत्ता संबंधी प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित फर्मों को ट्रेजरी के माध्यम से भुगतान किए जाने की जानकारी दी गई है।
साइंस किट की खरीदी भी राज्य स्तर से डायरेक्टरेट के माध्यम से ऑनलाइन प्रक्रिया के तहत किए जाने की बात कही गई है। संबंधित फर्म द्वारा संस्थानों में सामग्री पहुंचाई गई, जिसकी प्राप्ति पावती उपलब्ध होने का दावा है। इसके बाद टीम के माध्यम से सामग्री का गुणवत्ता परीक्षण और फिजिकल वेरिफिकेशन कराया गया। निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही भुगतान किए जाने की जानकारी सामने आई है।
वहीं स्वच्छता सामग्री की खरीदी जेम पोर्टल के माध्यम से किए जाने की बात कही गई है। सप्लायर द्वारा संबंधित विकासखंड शिक्षा अधिकारियों को सामग्री उपलब्ध कराई गई। इसके बाद स्टॉक में एंट्री कर सामग्री को संबंधित स्कूलों में वितरित कराया गया। वितरण और स्टॉक संबंधी प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित फर्म को भुगतान किया गया।
45.16 करोड़ रुपये के भुगतान पर भी डीईओ ने रखा पक्ष
वर्ष 2025-26 में किए गए क्रय के भुगतान की कुल राशि 45,166,159 रुपये को लेकर लगाए जा रहे आरोपों पर भी डीईओ मनीराम यादव ने अपना पक्ष रखा है। उनके अनुसार जांच दल द्वारा इस राशि को कथित तौर पर शासकीय राशि के गबन से जोड़कर प्रस्तुत किया गया, जिसके बाद सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में डीईओ द्वारा गबन किए जाने संबंधी खबरें सामने आईं।
डीईओ का कहना है कि शासकीय भुगतान जिला कोषालय अधिकारी द्वारा परीक्षण के बाद ही किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि जांच दल में जिला कोषालय अधिकारी भी सदस्य हैं। ऐसे में यदि शासकीय राशि के गलत भुगतान का सवाल उठता है तो भुगतान से जुड़ी पूरी प्रक्रिया और संबंधित स्तरों की भूमिका का परीक्षण भी जांच का हिस्सा होना चाहिए।
मनीराम यादव के अनुसार अधिकांश सामग्रियों के क्रय आदेश शासन स्तर से स्वीकृत किए गए थे। सामग्री प्राप्त होने के बाद उसकी पावती, भौतिक सत्यापन और गुणवत्ता प्रमाण-पत्र प्राप्त किए गए तथा नियमानुसार देयक जिला कोषालय कार्यालय को भेजे गए।
उन्होंने यह भी कहा कि जिला कोषालय द्वारा अधिकारियों और कर्मचारियों के छोटे-छोटे स्वत्वों के भुगतान में भी कई बार आपत्तियां लगाई जाती हैं। ऐसे में इतनी बड़ी शासकीय राशि के भुगतान के दौरान भी निर्धारित स्तर पर परीक्षण किए जाने की अपेक्षा स्वाभाविक है।
जांच के अंतिम निष्कर्ष से पहले फैसला उचित नहीं
डीईओ मनीराम यादव ने कहा है कि जांच दल द्वारा उनके कार्यालय से क्रय संबंधी सभी नस्तियां मूल रूप में उपलब्ध कराई गई थीं। इसके बावजूद यदि जांच प्रतिवेदन में राशि के गबन की बात कही गई है तो वे कलेक्टर के समक्ष अभिलेखों सहित अपना समाधानकारक उत्तर प्रस्तुत करेंगे।
उनका कहना है कि जांच दल के दोनों अधिकारी वरिष्ठ और जिम्मेदार अधिकारी हैं तथा पूरे मामले के वास्तविक तथ्यों का परीक्षण दस्तावेजों और प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने लगाए गए आरोपों को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि अंतिम निर्णय सक्षम स्तर की जांच और उपलब्ध अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही होना चाहिए।
प्रशासनिक कसावट को लेकर भी चर्चा
इधर विभागीय जानकारों के अनुसार, जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा जिले की शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक कसावट लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्कूलों में शिक्षकों की समय पर उपस्थिति, नियमित मॉनिटरिंग और शैक्षणिक व्यवस्था में सुधार पर जोर दिए जाने की बात सामने आई है।
जानकारों का यह भी कहना है कि प्रशासनिक निगरानी बढ़ने के बाद विद्यालयों में शिक्षकों की समय पर उपस्थिति को लेकर सुधार देखने को मिला है। कई मामलों में लोगों को अपनी समस्याओं के लिए सीधे जिला शिक्षा अधिकारी से मिलने का अवसर मिल रहा है, जिससे कार्यालयीन स्तर पर बिचौलियों की भूमिका सीमित होने की चर्चा है।
मंत्री ने भी प्रक्रिया को लेकर दिया बयान
इस पूरे विवाद के बीच स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव के बयान को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मंत्री ने कहा कि किसी राशि के स्वीकृत होने मात्र को घपला नहीं कहा जा सकता। उन्होंने वर्तमान में चल रही सेंट्रलाइज्ड टेंडर प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि खरीदी की प्रक्रिया शासन स्तर पर निर्धारित व्यवस्था के तहत होती है। मंत्री ने यह भी कहा कि आपसी द्वंद्व के कारण कुछ लोग डीईओ के पीछे पड़े हुए हैं।
फिलहाल इस मामले में आरोपों की अंतिम और स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। जांच की प्रक्रिया जारी है और डीईओ द्वारा अपना पक्ष अभिलेखों के साथ प्रस्तुत किए जाने की बात कही गई है। ऐसे में जांच पूरी होने और सक्षम स्तर से अंतिम निष्कर्ष सामने आने से पहले जिला शिक्षा अधिकारी मनीराम यादव को दोषी करार देना उचित नहीं होगा। फिलहाल उपलब्ध तथ्यों में उनका पक्ष यह है कि खरीदी, आपूर्ति, गुणवत्ता परीक्षण, भौतिक सत्यापन और भुगतान निर्धारित प्रक्रिया के तहत किए गए हैं।





